MP में सरकारी खरीद की गड़बड़ी: 392 अधिकारियों पर कार्रवाई, 7 बर्खास्त; लोकायुक्त की भी जांच

MP Government Procurement News 2026: मध्य प्रदेश में सरकारी खरीद में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर बड़ी कार्रवाई की जानकारी सामने आई है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के अनुसार, प्रदेश के नगरीय निकायों में खरीद से जुड़ी अनियमितताओं के मामलों में अलग-अलग स्तर के 392 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है। इनमें लगभग 135 मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) भी शामिल बताए गए हैं। सात अधिकारियों-कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त करने, लगभग ₹3–4 करोड़ की वसूली और 80 से अधिक ठेकेदारों-सप्लायरों के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी भी प्रकाशित हुई है।

यह मामला LED बल्ब, फिनाइल, कचरा वाहन और अन्य सामग्री की खरीद में अलग-अलग नगरीय निकायों द्वारा दर्ज की गई कीमतों के बड़े अंतर के कारण चर्चा में आया है। इसी बीच अक्टूबर 2026 में शिक्षा विभाग, बिजली वितरण कंपनी और जनजातीय कार्य विभाग से जुड़े अलग-अलग कथित रिश्वत मामलों में लोकायुक्त की कार्रवाई की खबरें भी सामने आई हैं। इन सभी मामलों की कानूनी स्थिति अलग है और इन्हें एक ही घोटाले का हिस्सा नहीं समझना चाहिए।

अभी तक की मुख्य बातें

  • नगरीय निकायों की खरीद संबंधी मामलों में 392 अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्रवाई की जानकारी।
  • इनमें लगभग 135 CMO शामिल बताए गए हैं।
  • सात अधिकारियों-कर्मचारियों की सेवा समाप्त किए जाने की जानकारी।
  • लगभग ₹3–4 करोड़ की वसूली किए जाने की बात कही गई।
  • 80 से अधिक ठेकेदारों और सप्लायरों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई।
  • लोकायुक्त की अलग-अलग कार्रवाइयों में शिक्षा, बिजली और जनजातीय कार्य विभाग से जुड़े मामले सामने आए।

1. मध्य प्रदेश में 392 अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों हुई?

25 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने नगरीय निकायों की खरीद के आंकड़ों की जाँच के दौरान कीमतों और खरीद प्रक्रिया में कई अंतर पाए। अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने बताया कि विभाग ने पहले भी कार्रवाई शुरू की थी और जाँच के बाद कार्रवाई का दायरा बढ़ा है।

यह विश्लेषण MP e-Nagar Palika और Government e-Marketplace (GeM) पोर्टल के खरीद संबंधी आंकड़ों के आधार पर किया गया बताया गया है। डिजिटल रिकॉर्ड और AI आधारित विश्लेषण से एक ही तरह की सामग्री के लिए अलग-अलग नगरीय निकायों द्वारा दर्ज कीमतों में अंतर सामने आया।

विवरण रिपोर्ट में बताई गई स्थिति
कार्रवाई के दायरे में अधिकारी-कर्मचारी 392
मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) लगभग 135
सेवा से बर्खास्त 7
बताई गई वसूली लगभग ₹3–4 करोड़
ठेकेदार और सप्लायर 80 से अधिक के खिलाफ कार्रवाई

ध्यान दें: 392 लोगों पर कार्रवाई का मतलब यह नहीं है कि सभी को नौकरी से निकाल दिया गया या सभी पर आपराधिक दोष सिद्ध हो चुका है। रिपोर्टों में वसूली, वेतनवृद्धि रोकने, पदावनति और सेवा समाप्ति जैसी अलग-अलग विभागीय कार्रवाइयों का उल्लेख है।

स्रोत: आज तक की रिपोर्ट, 25 अक्टूबर 2026 | The New Indian Express

2. ₹30 हजार के बल्ब की खबर कितनी सही है?

सोशल मीडिया पर “30 हजार रुपये का बल्ब” जैसी चर्चा हो रही है। उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्टों में एक नगरीय निकाय द्वारा 60-वॉट का LED बल्ब ₹306 में खरीदे जाने और भोपाल के एक निकाय में उसी प्रकार के बल्ब की कीमत ₹11,800 दर्ज होने का उदाहरण दिया गया है।

इन आंकड़ों को ध्यान से समझना जरूरी है। ₹11,800 प्रति बल्ब का उदाहरण प्रकाशित रिपोर्ट में दर्ज है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि पूरे मध्य प्रदेश में प्रत्येक बल्ब इसी कीमत पर खरीदा गया था। कीमतों के अंतर की जाँच में उत्पाद की वास्तविक विशेषताओं, मात्रा, आपूर्ति की शर्तों और खरीद के रिकॉर्ड को भी देखना जरूरी होगा।

तथ्य-जाँच

“₹30,000 प्रति बल्ब” के दावे को इस लेख में प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं लिखा जा रहा है। प्रकाशित रिपोर्ट में 60-वॉट LED बल्ब के लिए ₹11,800 की कीमत का उदाहरण मिला है। किसी दूसरे आंकड़े को जोड़ने से पहले उसका मूल सरकारी रिकॉर्ड या विश्वसनीय रिपोर्ट देखना आवश्यक है।

खरीद संबंधी रिपोर्ट में फिनाइल की कीमतों का भी उदाहरण दिया गया। एक नगरीय निकाय में फिनाइल ₹5 प्रति लीटर और दूसरे में ₹33,500 की कीमत दर्ज होने की बात कही गई। यह असामान्य अंतर जाँच का विषय है; लेकिन केवल कीमत के अंतर से किसी खास व्यक्ति का आपराधिक दोष सिद्ध नहीं होता।

LED बल्ब और फिनाइल के उदाहरणों वाली रिपोर्ट पढ़ें

3. क्या ₹1,134 करोड़ की खरीद में गड़बड़ी सामने आई?

25 अक्टूबर की एक रिपोर्ट में प्रदेश के 374 नगरीय निकायों की लगभग ₹1,134 करोड़ की खरीद का उल्लेख किया गया। इस खरीद में सामने आए मूल्य-अंतर और अन्य संभावित अनियमितताओं की जाँच की बात कही गई है। रिपोर्ट में लोकायुक्त द्वारा भी मामले की जाँच शुरू किए जाने का उल्लेख है।

यहाँ ₹1,134 करोड़ को चोरी या सिद्ध भ्रष्टाचार की रकम बताना सही नहीं होगा। यह रिपोर्ट में बताई गई खरीद का कुल मूल्य है। इसी तरह, लगभग ₹250 करोड़ की संभावित बचत का अनुमान भी सामने आया है, जिसे प्रमाणित नुकसान या वसूली की रकम नहीं समझना चाहिए।

सरल शब्दों में:

  • ₹1,134 करोड़: रिपोर्ट में बताई गई खरीद का मूल्य।
  • ₹250 करोड़: रिपोर्ट में उल्लेखित संभावित बचत का अनुमान।
  • ₹3–4 करोड़: संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों से वसूली की बताई गई राशि।

Deccan Chronicle की रिपोर्ट पढ़ें | The Indian Express की रिपोर्ट पढ़ें

4. अक्टूबर 2026 में लोकायुक्त की प्रमुख कार्रवाइयाँ

सरकारी खरीद की जाँच से अलग, अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में मध्य प्रदेश के विभिन्न विभागों से जुड़े कथित रिश्वत मामलों में लोकायुक्त कार्रवाई की खबरें सामने आईं। नीचे प्रत्येक मामले को अलग रखा गया है, ताकि पाठकों को स्पष्ट रहे कि ये अलग शिकायतें और अलग जाँच हैं।

मामला 1: झाबुआ जिला — शिक्षा विभाग

22 अक्टूबर 2026 की PTI आधारित रिपोर्ट के अनुसार, झाबुआ जिले में सरकारी बालक छात्रावास के अधीक्षक से लंबित वेतन बिलों को पास कराने के बदले ₹10,000 की कथित रिश्वत माँगने का मामला सामने आया। शिकायतकर्ता ने बताया कि उसके लगभग ₹2.30 लाख के लंबित बिलों से मामला संबंधित था।

रिपोर्ट में ब्लॉक शिक्षा कार्यालय के क्लर्क पवन सिंह बिलवाल को ₹10,000 लेते पकड़े जाने की जानकारी है। ब्लॉक शिक्षा अधिकारी जयनारायण बैरागी का नाम भी मामले में दर्ज किए जाने की बात कही गई। रिपोर्ट के समय दोनों के खिलाफ मामला दर्ज था, लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई थी। आगे की स्थिति के लिए नया आधिकारिक अपडेट आवश्यक है।

PTI आधारित रिपोर्ट पढ़ें

मामला 2: बदनावर, धार — बिजली वितरण कंपनी

23 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, इंदौर लोकायुक्त पुलिस ने मध्य प्रदेश पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के बदनावर ग्रामीण कार्यालय में तैनात लाइन ऑपरेटर सौरभ कुमार जैन को कथित रूप से ₹4,000 की रिश्वत लेते पकड़ा। शिकायतकर्ता किसान राजेश दास ने आरोप लगाया था कि अस्थायी कृषि बिजली कनेक्शन को स्थायी कराने के लिए ₹20,000 की माँग की गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, शिकायत की जाँच के बाद ट्रैप कार्रवाई की गई और ₹4,000 लेते समय आरोपी को पकड़ा गया। उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत मामला दर्ज होने की जानकारी प्रकाशित हुई। यह एक अलग लोकायुक्त मामला है और नगरीय निकायों की खरीद जाँच से सीधे जुड़ा हुआ नहीं बताया गया है।

Free Press Journal की रिपोर्ट पढ़ें

मामला 3: सीधी — जनजातीय कार्य विभाग

23 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, सीधी जिले में जनजातीय कार्य विभाग के कर्मचारी संजय सिंह को ₹40,000 की कथित रिश्वत लेते लोकायुक्त ने पकड़ा। शिकायतकर्ता का आरोप था कि दोबारा नौकरी पर रखने और पुराने वेतन के भुगतान के लिए ₹50,000 माँगे गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, ₹10,000 पहले दिए जा चुके थे और शेष ₹40,000 लेते समय कार्रवाई की गई।

रिपोर्ट में अधीक्षिका सुनीता पांडे की भूमिका से जुड़े आरोपों की भी जाँच होने की बात कही गई। इन आरोपों को सिद्ध तथ्य नहीं समझना चाहिए; संबंधित व्यक्ति की भूमिका का निर्णय जाँच और लागू कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होगा।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट पढ़ें

मामला 4: मंडला — नगरीय निकाय

26 सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, मंडला के नगरीय निकाय से जुड़े CMO गजानन नाफडे को ठेकेदार के लंबित बिलों के भुगतान के बदले ₹2 लाख की कथित रिश्वत लेते पकड़े जाने की खबर प्रकाशित हुई थी। यह सितंबर का अलग मामला है। इसे अक्टूबर में सामने आई राज्यव्यापी खरीद जाँच का हिस्सा बताने के लिए उपलब्ध रिपोर्टों में पर्याप्त आधार नहीं मिला है।

The Times of India की रिपोर्ट पढ़ें

5. अब तक किस विभाग में क्या कार्रवाई हुई?

विभाग / क्षेत्र रिपोर्ट में बताई गई कार्रवाई
नगरीय प्रशासन एवं विकास 392 अधिकारियों-कर्मचारियों पर विभिन्न विभागीय कार्रवाई; सात बर्खास्त; वसूली और सप्लायरों पर कार्रवाई
शिक्षा विभाग, झाबुआ ₹10,000 की कथित रिश्वत से संबंधित मामला; क्लर्क पकड़ा गया और दो अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज होने की रिपोर्ट
पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी, बदनावर ₹4,000 की कथित रिश्वत लेते लाइन ऑपरेटर पकड़ा गया
जनजातीय कार्य विभाग, सीधी ₹40,000 की कथित रिश्वत लेते कर्मचारी पकड़ा गया; अन्य भूमिका की जाँच का उल्लेख
नगरीय निकाय, मंडला — सितंबर ₹2 लाख की कथित रिश्वत से संबंधित पुरानी रिपोर्ट

जरूरी स्पष्टीकरण: ऊपर दिए गए विभागीय और लोकायुक्त मामलों को एक ही कार्रवाई में शामिल नहीं किया गया है। तारीख, स्थान, शिकायत और आरोप अलग हैं। किसी आरोपी के पकड़े जाने या मामला दर्ज होने का अर्थ यह नहीं कि अदालत में दोष सिद्ध हो चुका है।

6. AI और डिजिटल निगरानी से खरीद की गड़बड़ी कैसे पकड़ी गई?

रिपोर्टों के अनुसार, विभाग ने नगरीय निकायों के खरीद रिकॉर्ड का विश्लेषण करके एक ही तरह की सामग्री के लिए दर्ज कीमतों की तुलना की। AI आधारित विश्लेषण का उपयोग संभावित असामान्य कीमतों और खरीद संबंधी अंतर पहचानने के लिए किया गया।

ऐसी प्रणाली में किसी वस्तु का नाम, मात्रा, कीमत, सप्लायर और खरीद की शर्तों की तुलना की जा सकती है। इससे असामान्य लेनदेन की पहचान में मदद मिल सकती है। हालांकि, डिजिटल प्रणाली से सामने आया संकेत अपने-आप में भ्रष्टाचार का अंतिम प्रमाण नहीं होता; संबंधित बिल, अनुबंध, आपूर्ति और जिम्मेदारी की जाँच जरूरी रहती है।

7. सरकारी खरीद में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदारी कैसे तय होती है?

किसी भी खरीद में अनियमितता की जाँच करते समय यह देखा जाता है कि खरीद किस अधिकारी ने मंजूर की, किसने सामग्री की गुणवत्ता और कीमत की जाँच की, आपूर्ति वास्तव में हुई या नहीं, भुगतान किस आधार पर किया गया और लागू खरीद नियमों का पालन हुआ या नहीं।

मामले के अनुसार विभागीय जाँच, राशि की वसूली, वेतनवृद्धि रोकना, पदावनति, सेवा समाप्ति या आपराधिक जाँच जैसी अलग-अलग कार्रवाई हो सकती है। हर कार्रवाई के लिए लागू नियम और संबंधित व्यक्ति की भूमिका देखी जाती है।

इसी कारण 392 पर कार्रवाई, सात बर्खास्त कर्मचारियों और ₹3–4 करोड़ की वसूली के आंकड़ों को अलग-अलग समझना चाहिए। इन आंकड़ों को एक ही रकम या एक ही तरह की सजा के रूप में प्रस्तुत करना भ्रामक होगा।

8. आम नागरिक सरकारी खरीद और भ्रष्टाचार की शिकायत कहाँ करें?

यदि किसी नागरिक के पास सरकारी खरीद, बिल, रिश्वत की माँग या सार्वजनिक धन के दुरुपयोग से संबंधित ठोस जानकारी है, तो वह संबंधित विभाग के आधिकारिक शिकायत माध्यम या सक्षम जाँच एजेंसी से संपर्क कर सकता है। शिकायत में तारीख, स्थान, संबंधित कार्यालय, उपलब्ध दस्तावेज और घटना का स्पष्ट विवरण देना उपयोगी रहता है।

शिकायत करते समय निजी जानकारी को सार्वजनिक करने से बचें और सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति को बिना प्रमाण दोषी घोषित न करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

मध्य प्रदेश में 392 अधिकारियों पर कार्रवाई किस मामले में हुई?

यह कार्रवाई नगरीय निकायों में सरकारी खरीद की कथित वित्तीय अनियमितताओं और कीमतों में असामान्य अंतर की जाँच से संबंधित बताई गई है।

क्या सातों अधिकारियों को बल्ब खरीद मामले में बर्खास्त किया गया?

रिपोर्टों में सात अधिकारियों-कर्मचारियों की सेवा समाप्त किए जाने की जानकारी है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों से सभी सात मामलों को केवल LED बल्ब खरीद से जोड़ना उचित नहीं है।

क्या एक बल्ब ₹30,000 में खरीदा गया था?

उपलब्ध रिपोर्टों में 60-वॉट LED बल्ब की एक खरीद ₹11,800 की बताई गई है। ₹30,000 प्रति बल्ब के दावे की स्वतंत्र पुष्टि के लिए मूल रिकॉर्ड आवश्यक है।

क्या ₹1,134 करोड़ की चोरी साबित हो चुकी है?

नहीं। यह रिपोर्ट में उल्लेखित खरीद का कुल मूल्य है, सिद्ध चोरी की राशि नहीं। लगभग ₹250 करोड़ की संभावित बचत का अनुमान भी अलग है।

लोकायुक्त ने अक्टूबर 2026 में किन विभागों में कार्रवाई की?

प्रकाशित रिपोर्टों में झाबुआ के शिक्षा विभाग, बदनावर की पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी और सीधी के जनजातीय कार्य विभाग से जुड़े अलग-अलग कथित रिश्वत मामले सामने आए।

क्या इन सभी मामलों में आरोपियों का दोष सिद्ध हो गया है?

नहीं। कार्रवाई, गिरफ्तारी या मामला दर्ज होना और अदालत में दोष सिद्ध होना अलग-अलग चरण हैं। प्रत्येक मामले की कानूनी स्थिति अलग से जाँची जानी चाहिए।

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश में नगरीय निकायों की खरीद में कथित वित्तीय अनियमितताओं पर कार्रवाई का दायरा बड़ा है। 25 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों के अनुसार 392 अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई, सात सेवा समाप्तियाँ, ₹3–4 करोड़ की वसूली और 80 से अधिक ठेकेदारों-सप्लायरों के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी सामने आई। वहीं, अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में शिक्षा, बिजली वितरण और जनजातीय कार्य विभाग से जुड़े अलग-अलग कथित रिश्वत मामलों में भी लोकायुक्त कार्रवाई की खबरें प्रकाशित हुईं।

हालाँकि, सभी आंकड़ों को सही संदर्भ में समझना जरूरी है। ₹1,134 करोड़ खरीद का मूल्य है, ₹250 करोड़ संभावित बचत का अनुमान है और ₹3–4 करोड़ रिपोर्ट में बताई गई वसूली है। इसी तरह, बल्ब की कीमत का उदाहरण खरीद में अंतर दिखाता है, लेकिन किसी व्यक्ति के दोष को अपने-आप सिद्ध नहीं करता। नई सरकारी सूचना या जाँच की प्रगति सामने आने पर पाठकों को आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर अपडेट देखना चाहिए।

स्रोत और तथ्य-जाँच नोट:

यह लेख 25–26 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। खरीद की गड़बड़ी और अलग-अलग लोकायुक्त मामलों को अलग रखा गया है। आरोपों को सिद्ध अपराध के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। किसी भी नए नाम, विभागीय आदेश या अंतिम कानूनी परिणाम को जोड़ने से पहले आधिकारिक दस्तावेज़ से पुष्टि की जानी चाहिए।

 

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